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सुकून मिलता है-
बेशुमार फूलों के गले लगकर,
रंगों से लिपटकर,
इन्द्रधनु की चुनरी पहनकर,
सुकून मिलता है.......
अब याद नहीं आता,कि-
मैं चाँद के गाँव कब गई थी!
कोई रेशमी डोर थामकर शायद तुम्हीं आ गए थे,
देखा ,
तो विस्मित आँखें खुली रह गई थीं,
सोचकर सुकून मिलता है..................
मेरे सपनों के सोनताल में ,
कोई नन्हा कमल आज भी खिलता है!
उस दिन-
भोर की स्निग्ध किरणों का नाच-गान जारी था,
चतुर्दिक भैरवी की तान गूंज रही थी,
मैंने सुना,
"अम्मा मैं आ गया"
आवाज़ सुनकर मुझमें हरकत आई थी,
चेतना जगी थी....
पलकें खोल तुम्हारी ओर देखा था,
सोचकर सुकून मिलता है........................
सहसा मुझे ये पंक्तियाँ याद आयीं ,
नैनन की करी कोठरी ,
पुतली पलंग बिछाए,
पलकन की चिक डार के,
पिय को लिया रिझाए।'
चेहरे में मेरे आराध्य की छवि थी,
हर्षातिरेक से रोमांचित मेरा 'मैं' ,
तुम्हारे चरणों पर झुका -
या, माँ की ममता ने
फूल से दो नन्हे पाँव चूम लिए............
मेरे पुण्यों का फल सामने था,
सोचकर सुकून मिलता है..........................