मेरी दुनिया...

Sunday, March 23, 2008

हे प्रभु!


इस विराट पृथ्वी पर फैले
संबंधों का जाल
एक दिन
व्यर्थ सिद्ध होते हैं!
फिर, किसकी खोज में भटकता हैं मन?
ये चकित,चमत्कृत आँखें
विस्मय लिए डोलती हैं!
समझ नही पाता मन
क्या ढूँढती हैं!
कौन-सी चीज़ विद्युत सी चमक कर
व्याकुलता की ओर बढ़ाती है!
ख़ुद गाए गीतों से
या तुमसे कोई गीत सुनकर
क्यों मेरा 'मैं'
कतरे-कतरे में पिघलता हैं?
अन्तर में छिपा यह स्रोत कैसा हैं
जो कल-कल निनाद करता हैं?
हे प्रभु!
मेरे पल्ले आज तक
कुछ नहीं पड़ा !

5 comments:

mehek said...

अन्तर में छिपा यह स्रोत कैसा हैं
जो कल-कल निनाद करता हैं?
हे प्रभु!
मेरे पल्ले आज तक
कुछ नहीं पड़ा !shayad aaj tak koi nahi samajh saka,is baat ko,prabhu hi jane,bahut sundar bhav likhe hai.

रंजू said...

बहुत सुंदर यही चीज कोई समझ पाता टो दुःख किस बात का था .सुंदर रचना

ek insan said...

इस विराट पृथ्वी पर फैले
संबंधों का जाल
एक दिन
व्यर्थ सिद्ध होते हैं!
फिर, किसकी खोज में भटकता हैं मन?

aise shabd sun ke hee to kisee ke charan choone ka man karta hai par agar un men jadu huya aur main gayab ho gaya to? charan choo raha hoon mujh par jadoo nahee karana

Anil masomshayer

Dr. RAMJI GIRI said...

'फिर, किसकी खोज में भटकता हैं मन?"

यह तो सनातन यक्ष प्रश्न है...
युग -युगान्तर से इस उत्तर की तलाश में मानव और मनीषी दोनों लगे है... कहाँ सुलझ पाया है आजतक ...????

Mahesh said...

Mahesh

jivan kya ek dhua ! aur rangeen pani ka bul bula na jane kahan foot jaye !jivan ek kuhara bhi kuch dikhta hai kuch nahi bhi jo dikhta hai O such hai ya jo nahi dikhta hai O such hai eske pichhe kaun bhage kiske pass hai wokt itna jug jane kab chhoot jaye.